वट पूर्णिमा का धार्मिक महत्व ?
त्रिदेव का वास: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, वट वृक्ष (बरगद) के मूल (जड़) में भगवान ब्रह्मा, मध्य (तने) में भगवान विष्णु, और अग्र भाग (शाखाओं) में भगवान शिव का वास होता है। इसके साथ ही देवी सावित्री भी इस वृक्ष में निवास करती हैं।
सत्यवान-सावित्री की कथा: इसी दिन पतिव्रता सावित्री ने अपने ज्ञान, बुद्धिमत्ता और दृढ़ निश्चय से यमराज को विवश करके अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। यह घटना वट वृक्ष के नीचे ही हुई थी, इसलिए इस दिन बरगद की पूजा का विधान है।
मुख्य सामग्री: माता सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर, कलावा (कच्चा सूत/सफेद-पीला धागा)।
सुहाग सामग्री: कुमकुम, हल्दी, सिंदूर (अधिमानतः पीला सिंदूर), मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी और काजल।
खाद्य व भोग: भीगे हुए काले चने, पांच प्रकार के फल (विशेष रूप से आम और कटहल), मिठाई और पकवान।
अन्य: जल से भरा कलश, धूप-दीप, अक्षत (बिना टूटे चावल), बांस का पंखा और दान के लिए कपड़े व दक्षिणा।
“वटमूले स्थितो ब्रह्मा वटमध्ये जनार्दन:।
वटाग्रे तु शिवो देव: सावित्री वटसंश्रिता ।।”