योगिनी एकादशी व्रत
योगिनी एकादशी व्रत में जो लोग निराहार यानी भूखे नहीं रह पाते हैं, वे एक समय फलाहार कर सकते हैं, इसके साथ ही दूध और फलों का रस भी पी सकते हैं। जो लोग एकादशी व्रत नहीं कर पा रहे हैं, वे इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा कर सकते हैं, अगर विधिवत पूजा नहीं कर पा रहे हैं, तो विष्णु जी को जल और तुलसी चढ़ाकर भी सामान्य पूजा कर सकते हैं। ग्रंथों में लिखा है कि भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने से भी पूरे व्रत का पुण्य मिल सकता है।
एकादशी के दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या ॐ श्रीधराय नमः मंत्र का जाप करें
पौराणिक व्रत कथा
पद्मपुराण के अनुसार, अलकापुरी नगरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। उनका ‘हेममाली’ नाम का एक यक्ष सेवक था, जो रोज राजा की पूजा के लिए मानसरोवर से फूल लाता था। हेममाली अपनी अत्यंत सुंदर पत्नी विशालाक्षी के प्रेम में इतना अंधा था कि एक दिन वह फूलों को घर रखकर पत्नी के साथ समय बिताने लगा और राजा की पूजा के समय तक दरबार नहीं पहुंचा।राजा कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलाया और समय पर फूल न लाने का कारण पूछा। हेममाली ने डरकर सब सच बता दिया। क्रोध में आकर कुबेर ने उसे शाप दे दिया कि “तुम स्त्री का वियोग सहोगे और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कुष्ठ रोगी बनोगे”।शाप के प्रभाव से हेममाली पृथ्वी पर गिर गया और उसे भयानक कुष्ठ रोग हो गया। वह कई दिनों तक जंगलों में भटकता रहा। एक दिन भटकते हुए वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम पहुंचा। ऋषि ने उसका दुख देखकर उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने की सलाह दी। हेममाली ने पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया, उसे अपना दिव्य यक्ष रूप वापस मिला और वह अपनी पत्नी से दोबारा मिल सका।