जन्म और मृत्यु का चक्र
भारतीय दर्शन और सनातन धर्म (जैसे भगवद्गीता और गरुड़ पुराण) के अनुसार, आत्मा अजर-अमर, शाश्वत और अविनाशी है, जबकि शरीर क्षणभंगुर और नाशवान है। आत्मा एक शुद्ध ऊर्जा और चेतना है जो केवल कर्मों के आधार पर शरीर बदलती है।
कर्मों का सिद्धांत
तीन प्रकार के कर्म:संचित कर्म: हमारे पिछले सभी जन्मों के इकट्ठे किए गए कर्म।प्रारब्ध कर्म: संचित कर्मों का वह हिस्सा जो हमें इस वर्तमान जन्म में भुगतना पड़ रहा है (जैसे हमारा परिवार, रूप और परिस्थितियां)।आगामी कर्म: वह कर्म जो हम वर्तमान जीवन में स्वतंत्र इच्छा से कर रहे हैं और जो भविष्य का भाग्य तय करेंगे।
नए शरीर का निर्धारण
कर्मानुसार न्याय: यदि पुण्य अधिक हैं, तो आत्मा को कुछ समय के लिए स्वर्गलोक या उच्च योनियों में स्थान मिलता है। यदि पाप अधिक हैं, तो कष्ट भोगने के लिए निम्न योनियों या नरकलोक जाना पड़ता है।
नया जन्म: भोग पूरा होने के बाद, संचित कर्मों के आधार पर आत्मा को फिर से पृथ्वी पर 84 लाख योनियों में से किसी एक में (कीट, पशु, या मानव) नया शरीर मिलता है। मानव जन्म को सबसे दुर्लभ माना गया है क्योंकि केवल इसी जन्म में कर्मों को सुधारा जा सकता है।
वस्त्र बदलना: भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र पहनता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
नया जन्म: मृत्यु के तुरंत बाद या कर्मों के हिसाब से 3 दिन, 13 दिन या 1 वर्ष के भीतर आत्मा को उसके संचित कर्मों के आधार पर 84 लाख योनियों (पशु, पक्षी, कीट, मानव आदि) में से कोई एक नया शरीर मिलता है।
मोक्ष: जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है (आत्मज्ञान) और सभी कर्म बंधनों से मुक्त हो जाती है, तब उसे बार-बार शरीर धारण नहीं करना पड़ता, जिसे मोक्ष या मुक्ति कहा जाता है।