प्रदोष का महत्व
प्रदोष मुख्य रूप से हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए समर्पित एक अत्यंत शुभ समय और व्रत है।शाब्दिक अर्थ में ‘प्रदोष’ का मतलब शाम का समय (सूर्यास्त का समय) होता है, जब दिन और रात आपस में मिलते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जहाँ जीवन के सारे दोष शांत हो जाएँ, उसे प्रदोष कहते हैं।
रवि प्रदोष: रविवार को आने वाला व्रत, जो अच्छी सेहत और लंबी आयु (आरोग्य) प्रदान करता है।
पौराणिक कथा
स्कंद पुराण के अनुसार, एक प्राचीन कथा बहुत प्रचलित है:एक गरीब ब्राह्मणी अपने पति की मृत्यु के बाद अपने छोटे बेटे के साथ भीख मांगकर जीवन यापन करती थी। एक दिन उसे नदी किनारे विदर्भ देश का राजकुमार मिला, जिसके माता-पिता को शत्रुओं ने मार दिया था। ब्राह्मणी ने दया करके उसे अपने साथ रख लिया।कुछ समय बाद, ऋषि शांडिल्य के उपदेश से ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत रखना शुरू किया। व्रत के प्रभाव से राजकुमार की मुलाकात एक गंधर्व कन्या ‘अंशुमती’ से हुई, जिससे उसका विवाह हो गया। बाद में राजकुमार ने अपनी सेना तैयार कर अपने खोए हुए राज्य को वापस पा लिया। उसने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया। मान्यता है कि तभी से इस व्रत को करने वाले के सभी दुख दूर हो जाते हैं।
भगवान शिव की पूजा अत्यंत सरल और फलदायी मानी गई है। शिव पुराण के अनुसार, वे केवल एक लोटे जल और सच्ची श्रद्धा से भी प्रसन्न हो जाते हैं।
शिव पूजा के दौरान सावधानियां
शिवलिंग पर कभी भी हल्दी या कुमकुम (सिंदूर) न चढ़ाएं। यह माता पार्वती को चढ़ाया जाता है, शिव जी को केवल सफेद चंदन या भस्म लगाएं।
भगवान शिव की पूजा में तुलसी दल (पत्ते) का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। इसकी जगह केवल बेलपत्र का उपयोग करें।
शिवलिंग पर जो भी चावल चढ़ाएं, ध्यान रखें कि वे टूटे हुए न हों। हमेशा साबुत चावल ही अर्पित करें।
महादेव की पूजा में केतकी या केवड़े का फूल भूलकर भी न चढ़ाएं, क्योंकि यह शिव पूजा में श्रापित माना गया है।
शिवलिंग पर शंख से जल अर्पित नहीं करना चाहिए, क्योंकि शिव जी ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था।